महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव स्वजनों की हत्या के पाप से व्यथित थे। श्री कृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।
राजस्थान की धरती पर अनेक सांस्कृतिक रंग रह पग पर नजर आते हैं। वीर सपूतों की इस धरती पर धर्म और आध्यात्म के भी कई रंग दिखाई देते हैं। कहीं बुलट की बाबा के रूप में पूजा होती है तो कहीं तलवारों के साये में मां की आरती की जाती है तो एक मंदिर ऐसा भी है जिसने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान के हमले किए थे नाकाम। 'झलक राजस्थान की' सीरीज में एक ऐसे स्थान के बारे में बता रहा है जहां पानी में गल गई थी भीम की गदा और जिस जगह पर पत्नी संग रहने के लिए भगवान सूर्य को झेलने पड़े थे कष्ट।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने पूर्वजों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही भीम ने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।मान्यता है यह देश का पहला ऐसा मंदिर है जहां पत्नी छाया संग विराजते हैं सूर्य भगवान। घने जंगलों के बीच बसा है भगवान सूर्य का यह पवित्र धाम। यहां सूर्यदेव के लिए जगह पाना आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें कठोर तप से गुजरना पड़ा था। कहते हैं कि यह स्थान मालकेतू पर्वत से पूरी तरह ढ़का हुआ था। तब सूर्यदेव ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब भगवान सूर्य ने पत्नी संग रहने के लिए स्थान की मांग की थी। भगवान ने उनकी मनोकामना पूरी की। तभी से इस कूंड का नाम सूर्यकुंड पड़ गया।
राजस्थान की धरती पर अनेक सांस्कृतिक रंग रह पग पर नजर आते हैं। वीर सपूतों की इस धरती पर धर्म और आध्यात्म के भी कई रंग दिखाई देते हैं। कहीं बुलट की बाबा के रूप में पूजा होती है तो कहीं तलवारों के साये में मां की आरती की जाती है तो एक मंदिर ऐसा भी है जिसने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान के हमले किए थे नाकाम। 'झलक राजस्थान की' सीरीज में एक ऐसे स्थान के बारे में बता रहा है जहां पानी में गल गई थी भीम की गदा और जिस जगह पर पत्नी संग रहने के लिए भगवान सूर्य को झेलने पड़े थे कष्ट।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने पूर्वजों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही भीम ने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।मान्यता है यह देश का पहला ऐसा मंदिर है जहां पत्नी छाया संग विराजते हैं सूर्य भगवान। घने जंगलों के बीच बसा है भगवान सूर्य का यह पवित्र धाम। यहां सूर्यदेव के लिए जगह पाना आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें कठोर तप से गुजरना पड़ा था। कहते हैं कि यह स्थान मालकेतू पर्वत से पूरी तरह ढ़का हुआ था। तब सूर्यदेव ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब भगवान सूर्य ने पत्नी संग रहने के लिए स्थान की मांग की थी। भगवान ने उनकी मनोकामना पूरी की। तभी से इस कूंड का नाम सूर्यकुंड पड़ गया।
राजस्थान के शेखावाटी इलाके के झुन्झुनू जिले से 70 कि.मी. दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहाँ लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। झुन्झुनू जिले में अरावली पर्वत की शाखायें उदयपुरवाटी तहसील से प्रवेश कर खेतड़ी , सिंघाना तक निकलती हैं, जिसकी सबसे ऊँची चोटी 1050 मीटर लोहार्गल में है।
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पाण्डव स्वजनों की हत्या के पास से व्यथित थे। श्री कृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्य कुण्ड में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।
लोहार्गल में सिर्फ पाण्डवों ने ही कुल हत्या का पाप नहीं धोया था, बल्कि ये जगह गवाह है परशुराम के पश्चाताप की भी, विष्णु के छठें अंश अवतार ने परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।
पहले यहाँ सिर्फ साधू-सन्यासी ही रहा करते थे, पर अब गृहस्थ लोग भी रहने लगे हैं। यहाँ एक बहुत विशाल बावड़ी है जो महात्मा चेतन दास जी ने बनवाई थी, यह राजस्थान की बड़ी बावडि यों में से एक है। साथ के पहाड पर प्राचीन सूर्य मन्दिर बना हुआ है। साथ ही वनखण्डी जी का मन्दिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर तथा पाण्डव गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढियाँ चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किये जा सकते हैं। यहाँ समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। हजारों नर-नारी यहाँ आ कुण्ड में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल है। लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है। भक्तों का यहाँ आना-जाना लगा रहता है फिर भी इस क्षेत्र की हालत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं है। चारों ओर गन्दगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इन्तजाम नहीं है। यदि इस ओर थोडा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहाँ देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरू हो सकता है।

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